जासूसी मामले को अनावश्यक तूल

 जासूसी मामले को अनावश्यक तूल

संजय गुप्त जी लिखित आलेख 'जासूसी मामले की सच्चाई को पढ़ने का अवसर मिला। लेख सारगर्भित है और विपक्ष द्वारा मानसून सत्र के आरंभ होते ही कथित पेगासस फोन हैकिंग के मामले को अनावश्यक रूप से उछालने की कोशिश के पीछे की वास्तविक मंशा को उजागर करता है। अब जबकि एमनेस्टी इंटरनेशनल (जिसका भारत के प्रति गंभीर पूर्वाग्रह रखने का एक लंबा इतिहास रहा है) स्वयं स्वीकार कर रहा है कि वह वाछित लोगों के फोन को हैक कर जासूसी किए 'जाने की पुष्टि नहीं कर सकता तो फिर किस आधार पर विपक्ष इसे इतना तूल दे रहा है। कहीं वह जाने- "अनजाने सचमुच किसी अंतरराष्ट्रीय साजिश का हिस्सा तो नहीं बन रहा, जिसका जिक्र विदेश राज्यमंत्री ने किया है। ऐसा इसलिए भी, क्योंकि चाहे शाहीन बाग का धरना हो अथवा वर्तमान में चल रहा कथित. किसान आंदोलन (इस बात पर भी विचार कर लिया जाए कि देश के कुल 28 राज्यों में से दो अथवा तीन राज्यों के कुछ संपन्न किसानों और किसानों के रूप में मंडी के बिचौलियों के द्वारा आंदोलन के नाम पर महत्वपूर्ण रास्तों-चौराहों को कब्जा किए जाने को किस हद तक किसान आंदोलन की संज्ञा दी जाए), सभी में अंतरराष्ट्रीय साजिश के संकेत मिले हैं।

जासूसी मामले को अनावश्यक तूल

बहरहाल कोई यह न भूले कि देश की आंतरिक सुरक्षा और राष्ट्रीय हित के लिए केंद्र सरकार को समुचित कदम उठाने का पूरा अधिकार है। यह सही है कि ऐतिहासिक काल के आरंभ से ही राष्ट्रहित में गुप्तचरों की सेवाएं ली जाती रही हैं। भारतवर्ष को पहली बार एक राजनीतिक सूत्र में बांधने वाले मौर्यवंशी राजाओं के समय भी राज्य भर में 'संस्था' और 'संचार' नाम से जाने जाने वाले गुप्तचरों का जाल बिछा होता था, जो छोटी से छोटी, यद्यपि महत्वपूर्ण घटनाओं की सूचना राजमहल तक पहुंचाते थे। हां, केंद्र सरकार इस बात को सुनिश्चित करे कि डिजिटल तकनीक के वर्तमान युग में निजी डाटा के बेजा इस्तेमाल से लोगों की निजता भंग न हो, उनके जीवन और सम्मान की सुरक्षा बनी रहे।


चंदन कर्ण, झारखंड

Post a Comment

0 Comments
* Please Don't Spam Here. All the Comments are Reviewed by Admin.