वतन हमारा

 वतन हमारा

अमृत  महोत्सव

गीत

बढ़ते प्रगति पथों पर

हम ज्ञान के सहारे

श्रम के गुंजायमान नारे

जन गण उदार मन से

विज्ञान गा रहा है|


सम्मान से हमें अब

यह जग पुकारता है

हर एक देशवासी

 प्रण- प्राण वारता है।


सौहार्द

प्रेम समता

मन को सुहा रहा है।


दुनिया महानता के 

नवगीत गा रही है। 

यह मातृभूमि तन-मन सबका लुभा रही है|

मोहक

स्वरूप इसका जादू जगा रहा है |

उत्सव

स्वतंत्रता के

भारत मना रहा है|


मिटकर स्वयं जिन्होंने 

प्यारा वतन संवारा

 सेनानियों को सबसे पहले नमन हमारा |


उत्सर्ग

आज उनका

अब रंग ला रहा है |




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