बस्ती। कर्बला के शहीदों का बीसवा मंगलवार को मनाया गया। रहमतगंज, गांधी नगर स्थित इमामबाड़ा शब्बीर हुसैन में मजलिस का आयोजन किया गया। ताबूत व अलम सजाकर सोगवारों ने इसकी जियारत की। अंजुमने हैदरी हल्लौर ने नौहा व मातम किया। अंजुमन के नौहा ख्वा सज्जाद हैदर व सावन हल्लौरी ने नौहा पेश किया। मोहम्मद रफीक व सुहेल हैदर ने सोज व सलाम पेश किया।
मजलिस को खिताब फरमाते हुए मौलाना जमाल हैदर ने कहा कि कर्बला की बुनियाद तो गदीर में ही पड़ गई थी। पैगम्बर के आंख बंद करने के साथ ही आले रसूल के छुपे हुए दुश्मन सामने आ गए। बनी उमैया के लोग अहलेबैत की मुलालिफत में सबसे आगे थे। इसी का नतीजा था कि पैगम्बर की बेटी हजरत फातमा जहरा के घर पर हमला किया गया, घर को जलाने का प्रयास किया गया। मौला अली पर जुल्म ढ़ाया गया और उनसे बैयत तलब की गई। सितम यहीं पर नहीं रुका। पैगम्बर के जानशीन मौला अली को हजारों मेम्बरों से तकरीबन 70 साल तक गालियां दी गईं। उमर बिन अब्दुल अजीज के दौर में उसने इस पर पाबंदी लगाई। कर्बला अहलेबैत की दुश्मनी की इंतेहा का नाम है।
उन्होंने कहा कि कर्बला में इमाम व उनके साथियों को शहीद कर यजीद ने समझा था कि अब पैगम्बर की आल का नाम लेने वाला कोई नहीं बचा है। इस दौर में इमाम हुसैन के बेटे इमाम जैनुल आब्दीन व इमाम हुसैन की बहन हजरत जैनब ने जगह-जगह इमाम हुसैन की फर्शे अजा बिछाई व लोगों को कर्बला में हुए जुल्म को बताया। यही सिलसिला आज भी मजलिसों के रूप में कायम है। हम जिस तरह अपने मरने वालों का दसवा, बीसवा व चालीसवा मनाते हैं, उसी तरह कर्बला के शहीदों का भी मनाते हैं। जिन शहीदों को कफन तक नहीं नसीब हुआ था, आज उनका गम पूरी दुनिया में मनाया जा रहा है।सरवर हुसैन, मौलाना हैदर मेंहदी, मौलाना अली हसन, जीशान रिजवी, शम्स आबिद, आले मुस्तफा, जावेद, सफदर रजा सहित अन्य मौजूद रहे।