घर के पिछवाडें मुर्गी पालन, अतिरिक्त आय का श्रोत

 घर के पिछवाडें मुर्गी पालन, अतिरिक्त आय का श्रोत 

नगर बाजार(बस्ती)

 बैकयार्ड मुर्गी पालन यानि पारम्परिक मुर्गी पालन अथवा घर के पिछवाडें मुर्गी पालन की यह पद्धति भारत में प्राचीन काल से ही प्रचलित है। इसमें प्रायः 5-10 मुर्गियों को एक परिवार द्वारा पाला जाता है, जो घर एवं उसके आस-पास में अनाज के गिरे दाने, झाड-फूसों के कीडे-मकोडे, घास की कोमल पत्तियाॅ तथा घर की जूठन आदि खाकर पेट भरती है। इस प्रकार से मुर्गियों को पालने में न किसी विशेष घर की आवश्यकता होती है और न ही किसी विशेष दाने की आवश्यकता होती है अर्थात न्यूनतम् खर्चे पर मुर्गियाॅ पाली जा सकती है। यह जानकारी आचार्य नरेन्द्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, कुमारगंज, अयोध्या द्वारा संचालित कृषि विज्ञान केन्द्र बस्ती के केन्द्राध्यक्ष, प्रो0 एस0एन0 सिंह ने क्षमता विकास योजनान्तर्गत आयोजित मुर्गी पालन प्रशिक्षण में प्रशिक्षणार्थियों को सम्बोधित करते हुए प्रदान की। उन्होने अवगत कराया कि वर्ष भर में प्रति व्यक्ति 180 अण्डा एवं 11 किग्रा माॅस के सापेक्ष मात्र 70 अण्डा एवं 3.8 किग्रा माॅस ही उपलब्ध हो पा रहा है। बैकयार्ड मुर्गी पालन से ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक रूप से पिछडे लोगों को न केवल न्यूनतम् खर्चे पर माॅस एवं अण्डे के रूप में उच्च गुणवत्ता का प्रोटीन उपलब्ध हो जाता है बल्कि कुछ मात्रा में माॅस व अण्डा वेंचकर कुछ अतिरिक्त आमदनी भी प्राप्त की जा सकती है।  

 पशुपालन विशेषज्ञ डा0 डी0के0 श्रीवास्तव ने अवगत कराया कि घर के पिछवाडें मुर्गी पालन के लिए किसी अतिरिक्त जमीन तथा श्रम की आवश्यकता नही होती है। इसमें एक दिवसीय चूजों की खरीद के लिए बहुत ही कम पंूजी की आवश्यकता होती है। मुर्गियाॅ अवशिष्ट पदार्थों एवं कीडे-मकोडों को उच्च प्रोटीन वाले अण्डे एवं माॅस में बदलकर न केवल खाद्य सुरक्षा बल्कि स्वच्छ प्रर्यावरण बनाने, खाद के द्वारा भूमि की उर्वराशक्ति बढाने एवं ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक रूप से पिछडे कृषकों, वेरोजगार नवयुवक-नवयुवतियों को स्वरोजगार प्रदान कर स्वालम्बी बनाती है तथा कुछ हद तक कुपोषण की समस्या से भी निजात दिलाती है। उन्होने अवगत कराया कि घर के पिछवाडें मुर्गी पालन हेतु कडकनाथ, बनराजा, ग्राम प्रिया, गिरि राजा, कैरी निर्भीक, कैरी श्यामा, हितकारी, उपकारी व कैरी प्रिया आदि नस्लें उपयुक्त है, जिनसे वर्ष भर 180-200 अण्डे तथा 8-10 सप्ताह में 1.00-1.25 किग्रा तक शारीरिक वजन प्राप्त कर लेती है। 

 पौध रोग वैज्ञानिक, डा0 प्रेम शंकर ने अवगत कराया कि देशी मुर्गियों में रोग बहुत ही कम लगते है फिर भी वचाव हेतु मरेक्स, लसोटा, गम्वोरो आदि का टीकाकरण अवश्य करवाना चाहिए क्योंकि ये बीमारियाॅ मुर्गियों में बहुत तेजी से फैलती है तथा कम समय में मुर्गियाॅ अधिक मर जाती है। इसलिए इलाज से बचाव वेहतर है। उन्होने कहा कि मुर्गियों को सदैव ताजा एवं साफ पानी पिलाना चाहिए तथा उसे फिटकरी व एक्वाफ्रेस (5 मिली. प्रति ली. पानी में घोलकर) से उपचारित करके ही पिलायें। 

 वरिष्ठ वैज्ञानिक डा0 आर0वी0 सिंह ने बायोसिक्योरिटी पर चर्चा करते हुए अवगत कराया कि मुर्गीशाला में किसी भी व्यक्ति को सीधे अन्दर न जाने दें। अन्दर जाने वाले व्यक्ति को फार्मलीन से सेनीटाइज कराने के उपरान्त या जूता, चप्पल, कपडों को बदलकर ही मुर्गीशाला में प्रवेश करने से बाहर से रोग प्रवेश नही कर पायेगा तथा मुर्गियाॅ सुरक्षित रहकर अधिक उत्पादन दें सकेगी।   

 इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में मुर्गी पालक, बेरोजगार नवयुवक-नवयुवतियाॅ, कृषक व कृषक महिलायें सम्मिलित हुयी। इस अवसर पर केन्द्र के वैज्ञानिकों के साथ-साथ जे0पी0 शुक्ला, निखिल सिंह, प्रहलाद सिंह, बनारसी व सीताराम आदि कार्मिक भी उपस्थित रहे।

Post a Comment

0 Comments
* Please Don't Spam Here. All the Comments are Reviewed by Admin.