अंटार्कटिका पर भारत का तीसरा स्टेशन स्थापित

 अंटार्कटिका पर भारत का तीसरा स्टेशन स्थापित

अंटार्कटिका में भारत का तीसरा स्थायी स्टेशन 'भारती' वर्ष 2012 से अपना कार्य प्रारंभ कर देगा। इससे भूकंप संबंधी हलचलों, जलवायु परिवर्तन एवं चिकित्सा शोध में काफी सहायता मिलेगी। इसका निर्माण राष्ट्रीय अंटार्कटिका एवं समुद्री केंद्र, गोवा के सहयोग से किया गया है। इस पर लगभग 250 करोड़ रुपये व्यय किये गये हैं। यहां 35 वैज्ञानिकों एवं 10 कर्मचारियों के रहने की व्यवस्था है। 'भारती' की स्थापना अंटार्कटिका के लार्समैन हिल में की गयी है, जो शिमाकर क्षेत्र से लगभग 3 हजार किलोमीटर की दूरी पर है। भारत का दूसरा स्टेशन मैत्री यहीं पर है। उल्लेखनीय है कि, अंटार्कटिका में भारत दो स्टेशन पहले ही स्थापित कर चुका है, जिनके नाम हैं, 'दक्षिण गंगोत्री' (1984 में) एवं 'मैत्री' (1989-90 में)।

अंतरिक्ष से आया है, सोना तथा प्लैटिनम

वैज्ञानिकों का दावा है कि धरती पर वर्तमान में विद्यमान सोना एवं प्लैटिनम अंतरिक्ष से आया है। उनका दावा है कि 4 अरब वर्ष पूर्व विशाल उल्कापिंड की वर्षा के साथ ये कीमती धातुयें धरती पर आयीं। यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिस्टल के -वैज्ञानिकों ने यह भी पता लगाया कि धरती पर इतना सोना एवं प्लैटिनम भू है कि इससे पूरी सतह पर इन धातुओं की चार मीटर मोटी सतह बिछाई जा सकती है।

अंटार्कटिका पर भारत का तीसरा स्टेशन स्थापित  अंटार्कटिका में भारत का तीसरा स्थायी स्टेशन 'भारती' वर्ष 2012 से अपना कार्य प्रारंभ कर देगा। इससे भूकंप संबंधी हलचलों, जलवायु परिवर्तन एवं चिकित्सा शोध में काफी सहायता मिलेगी। इसका निर्माण राष्ट्रीय अंटार्कटिका एवं समुद्री केंद्र, गोवा के सहयोग से किया गया है। इस पर लगभग 250 करोड़ रुपये व्यय किये गये हैं। यहां 35 वैज्ञानिकों एवं 10 कर्मचारियों के रहने की व्यवस्था है। 'भारती' की स्थापना अंटार्कटिका के लार्समैन हिल में की गयी है, जो शिमाकर क्षेत्र से लगभग 3 हजार किलोमीटर की दूरी पर है। भारत का दूसरा स्टेशन मैत्री यहीं पर है। उल्लेखनीय है कि, अंटार्कटिका में भारत दो स्टेशन पहले ही स्थापित कर चुका है, जिनके नाम हैं, 'दक्षिण गंगोत्री' (1984 में) एवं 'मैत्री' (1989-90 में)।  अंतरिक्ष से आया है, सोना तथा प्लैटिनम  वैज्ञानिकों का दावा है कि धरती पर वर्तमान में विद्यमान सोना एवं प्लैटिनम अंतरिक्ष से आया है। उनका दावा है कि 4 अरब वर्ष पूर्व विशाल उल्कापिंड की वर्षा के साथ ये कीमती धातुयें धरती पर आयीं। यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिस्टल के -वैज्ञानिकों ने यह भी पता लगाया कि धरती पर इतना सोना एवं प्लैटिनम भू है कि इससे पूरी सतह पर इन धातुओं की चार मीटर मोटी सतह बिछाई जा सकती है।  कैसे आई धातु धरती पर धरती के निर्माण के समय इस पर विद्यमान सोना और प्लैटिनम धरती के अंदर चले गये थे। इनके अन्य धातुओं से मिल जाने से धरती पर ये धातुयें समाप्त हो गयीं। कुछ लाख वर्ष के बाद प्रलय में हुयी उल्कापिंड वर्षा के साथ ये धातुयें धरती पर वापस आ गयीं। 2 हजार अरब करोड़ टन धातु की इस दौरान वर्षा हुयी थी। इसमें सोना और प्लैटिनम भी थे।  धरती जैसे वातावरण वाले ग्रह की खोज  नवंबर 2011 में वैज्ञानिकों ने एक ऐसे ग्रह को खोज निकालने का दावा किया है, जिसका वातावरण पृथ्वी जैसा है और इस पर जल और जीवन की संभावना भी हो सकती है। ग्लीज 581-जी नामक यह ग्रह पृथ्वी 123 हजार अरब मील दूर है और वह एक सितारे के चारों ओर उतनी ही दूरी से चक्कर लगाता है, जिसके कारण यह ऐसे ग्रह की उम्मीद जगाता है, जहां पानी और जीवन होने की संभावना होती है।  एस्ट्रोफिजिकल पत्रिका में प्रकाशित समाचार के अनुसार, इस ग्रह की सतह पर पानी की विद्यमानता संभव है, जिसका अर्थ है कि यह पृथ्वी के समान ग्रहों की सूची में अग्रणी है। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के खगोल विज्ञान और खगोल भौतिकी के प्रोफेसर और शोधकर्ता स्टीन वोग्ट ने कहा, "हमारे नतीजों से एक ऐसे ग्रह का मामला सामने आया है जिस पर जीवन पाये जाने की काफी संभावनाएं है।"

कैसे आई धातु धरती पर धरती के निर्माण के समय इस पर विद्यमान सोना और प्लैटिनम धरती के अंदर चले गये थे। इनके अन्य धातुओं से मिल जाने से धरती पर ये धातुयें समाप्त हो गयीं। कुछ लाख वर्ष के बाद प्रलय में हुयी उल्कापिंड वर्षा के साथ ये धातुयें धरती पर वापस आ गयीं। 2 हजार अरब करोड़ टन धातु की इस दौरान वर्षा हुयी थी। इसमें सोना और प्लैटिनम भी थे।

धरती जैसे वातावरण वाले ग्रह की खोज

नवंबर 2011 में वैज्ञानिकों ने एक ऐसे ग्रह को खोज निकालने का दावा किया है, जिसका वातावरण पृथ्वी जैसा है और इस पर जल और जीवन की संभावना भी हो सकती है। ग्लीज 581-जी नामक यह ग्रह पृथ्वी 123 हजार अरब मील दूर है और वह एक सितारे के चारों ओर उतनी ही दूरी से चक्कर लगाता है, जिसके कारण यह ऐसे ग्रह की उम्मीद जगाता है, जहां पानी और जीवन होने की संभावना होती है।

एस्ट्रोफिजिकल पत्रिका में प्रकाशित समाचार के अनुसार, इस ग्रह की सतह पर पानी की विद्यमानता संभव है, जिसका अर्थ है कि यह पृथ्वी के समान ग्रहों की सूची में अग्रणी है। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के खगोल विज्ञान और खगोल भौतिकी के प्रोफेसर और शोधकर्ता स्टीन वोग्ट ने कहा, "हमारे नतीजों से एक ऐसे ग्रह का मामला सामने आया है जिस पर जीवन पाये जाने की काफी संभावनाएं है।"

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