अपने ऐतिहासिक अस्तित्व की लड़ाई लड़ता इतिहासिक स्थल महुआ डाबर

 अपने ऐतिहासिक अस्तित्व की लड़ाई लड़ता इतिहासिक स्थल महुआ डाबर

 नगर बाजार संवाददाता शकील खान

यूपी बस्ती।  1857 गुलामी की बेड़ियों में जकड़े अपने वतन की आजादी की चाह में रणबांकुरे ने मोर्चा खोल दिया था 9: 10 मई 1857 मे मेरठ से बगावत की आग सुलगनी शुरू हो गई। क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी सेना के जुल्म से तंग आकर उन्हें सबक सिखाने को ठानी। संयोग से मौका जल्दी ही हाथ आ गया। धानपुर तालुका से पूर्व सेनापति रहे पिरई खां की अगुवाई में रहे क्रांतिकारी योद्धाओं ने अंग्रेजी हुकूमत की चूले हिला कर रख दिया।


अपने क्रांतिकारी साथियों के साथ इस इलाके को रणभूमि में तब्दील कर दिया । क्रांतिकारी पीरई खां की अगुवाई में उनके इंकलाब साथी देश पर मर मिटने पर आमादा हो गए 10 जून 1857 को अंग्रेजी सेना के लेफ्टिनेंट लैंडसे, लेफ्टिनेंट थामस, लेफ्टिनेंट इंग्लिश, लेफ्टिनेंट एडवर्ड, लेफ्टिनेंट काकॅल, सर्जेंट बुशर फैजाबाद से बिहार के दानापुर (पटना) जा रहे थे। इधर पिरई खा के नेतृत्व में उनके गोरिल्ला क्रांतिकारी साथियों ने अंग्रेजी सेना के कुख्यात अफसरों की घेराबंदी करके उनका संहार कर दिया । अंग्रेजी सेना के छा अफसरोद के मौत के बाद सर्जेंट बुशर घायल अवस्था में किसी तरह से अपनी जान बचाकर भाग निकला । उसने अंग्रेजी हुकूमत के अधिकारियों को सारी घटना की जानकारी अपने छा अफसरो की मौत से बौखलाई अंग्रेजी सेना 20 जून 1857 बस्ती के तत्कालीन मजिस्ट्रेट पेपे की अगुवाई में अंगेजी फौजियों की मदद से 5000 की आबादी वाले महुआडाबर गांव को घेर कर जला दिया । उसे गैर चिरागी घोषित कर दिया यहां पर अंग्रेजों के चंगुल में आए निवासियों के सिर कलम कर दिए गए इनके शव के टुकड़े-टुकड़े करके दूर ले जा कर फेंक दिया गया इतना ही नहीं अंग्रेज अफसरों की हत्या के अपराध में जननायक रेखा का भेद जानने के लिए गुलाम खान, गुलजार खान, पठान निहाल खान, घीसा खान पठान, और बदलू खान पठान, आदि क्रांतिकारियों को 18 फरवरी 1858 सरेआम फांसी दे दी गई । महुआ डाबर के अस्तित्व को मिटाने के लिए पेपे विलियम्स को ब्रिटिश सरकार ने सम्मानित भी किया था। भुला दी गई गौरवशाली विरासत पुरातत्व विभाग की तरफ से यहां दो बार खुदाई हो चुकी है।

शासन-प्रशासन महुआ डाबर के लिए कई बार घोषणाएं की मगर अभी तक एक अदद स्मारक भी नही है । क्रांतिकारी पीरई खां के नाम से भी कोई स्मृति चिन्ह नहीं है । महुआ डाबर और पूरा पिरई गांव गुमनामी के अंधेरे में सिमट कर रह गया है। इस ऐतिहासिक स्थान का कोई सुध लेने वाला नही है।

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