इमामबाड़ा शाबान मंजिल में तीसरी मोहर्रम को मजलिस आयोजित

 अल्लाह की निशानियों में शामिल है ताजिया व अलम

- इमामबाड़ा शाबान मंजिल में तीसरी मोहर्रम को मजलिस आयोजित


बस्ती। इमामबाड़ा शाबान मंजिल में तीसरी मोहर्रम को आयोजित मजलिस को सम्बोधित करते हुए मौलाना मोहम्मद हैदर खां ने कहा कि ताजिया व अलम अल्लाह की निशानियों में शामिल है। इसकी जियारत व ताजीम हर कलमा पढ़ने वाले पर वाजिब है। इमाम ने कर्बला के मैदान में अपनी कुर्बानी पेश कर अल्लाह के दीन को बचाने का काम किया है। यजीद जुआ, शराब, सामंती जुल्म व राजशाही को इस्लाम का अंग बनाना चाहता था। अगर इमाम हुसैन यजीद की बैयत कर लेते तो आज तमाम बुराईयां शरीयत का अंग बन चुकी होती। मोहर्रम में निकलने वाला ताजिया कर्बला में इमाम की शहादत की याद दिलाता है। 

मौलान हैदर ने कहा कि हजरत इब्राहीम ने जब अपने बेटे हजरत इस्माईल को अल्लाह की राह में कुर्बान करना चाहा तो अल्लाह ने उनकी कुर्बानी को जिब्हे अजीम (महान कुर्बानी) में तब्दील कर दिया। जिब्हे अजीम कर्बला में पैगम्बर के नवासे इमाम हुसैन की कुर्बानी है। आज भी हम हजरत इस्माईल की कुर्बानी की याद में जिस बकरे की कुर्बानी करते हैं, तो उस जानवर की भी ताजीम करते हैं। 

उन्होंने कहा कि काबा की तर्ज पर हम मस्जिदों का निर्माण करते हैं। मस्जिद बन जाने के बाद हर मुसलमान पर यह वाजिब हो जाता है कि वह उसकी ताजीम करे। उसी प्रकार ताजिया इमाम हुसैन के रौजे की नकल है। जब ताजिया को इमाम के रौजे से निस्बत दे दी गई तो हम इमाम के मानने वाले ताजिये की ताजीम करते हैं। 

इमामबाड़ा सगीर हैदर, रियाजुल हसन, एजाज हुसैन व इमामबाड़ा खुर्शेद हसन में भी मजलिस का आयोजन हुआ। मोहम्मद रफीक, सुहेल बस्तवी, सफदर रजा सहित अन्य ने सोज व सलाम पेश किया। 


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