बस्ती: कुपोषित बच्चों में सुपोषण बांट रही हैं डॉयटीशियन रेनू

 कुपोषित बच्चों में सुपोषण बांट रही हैं डॉयटीशियन रेनू

- कुपोषण से निजात में डॉयटीशियन निभा रही महत्वपूर्ण किरदार

- कुपोषण की पहचान से लेकर खुराक तय करने तक में निभातीं हैं अहम भूमिका

बस्ती। कुपोषित बच्चों को सेहतमंद बनाने में डॉयटीशियन का काफी अहम रोल होता है। पोषण पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) वार्ड में भर्ती होने वाले बच्चों के कुपोषण की पहचान से लेकर बच्चे की खुराक तय करने की जिम्मेदारी उनकी होती है। डिस्चार्ज होने के बाद समय-समय पर मरीज का फॉलोअप भी डॉयटीशियन करती है। जिला अस्पताल के एनएआरसी वार्ड में इस भूमिका में तैनात डॉयटिशियन रेनू पांडेय बच्चों में सुपोषण बांट रही हैं।


वार्ड का संचालन 29 मार्च 2016 से किया जा रहा है, तभी से रेनू अपनी सेवाएं दे रही हैं। अब तक 622 अति कुपोषित बच्चे सेहतमंद हो चुके हैं। नोडल ऑफिसर डॉ. सरफराज ने बताया कि बच्चों को सुपोषित बनाने में डॉयटीशियन की अहम भूमिका है। यहां पर छह माह से पांच साल तक के बच्चों को भर्ती किया जा रहा है।  कुपोषण की जांच, मीनू चार्ट तैयार करना व भर्ती रहने के दौरान उसकी सेहत पर नजर रखने की जिम्मेदारी डॉयटीशियन की होती है। डिस्चार्ज होने के बाद दो माह तक 15-15 दिन पर बच्चे को बुलाकर उसका फॉलो अप भी करती हैं। 

वजन और लम्बाई के सहारे होती है सैम की पहचान

डॉयटीशियन रेनू का कहना है कि जबसे वार्ड शुरू हुआ है, वह सेवाएं दे रही हैं। सीएचसी से रेफर होकर बच्चे यहां आते हैं। यहां वजन और लम्बाई आदि के सहारे (सीवीयर एक्यूट मॉल न्यूट्रीशियन) सैम की पहचान होती है। शुगर, बुखार व डिहाईड्रेशन की जांच कराते हैं। एपीटाइट टेस्ट (भूख की जांच) करके उसी आधार पर भोजन की मात्रा निर्धारित करते हैं। 

हल्के दूध व लाई से शुरू होती है खुराक

रेनू पांडेय ने बताया कि कुपोषित बच्चों के इलाज में उनकी खुराक की मात्रा व प्रकार का निर्धारण महत्वपूर्ण होता है। पहले दिन दो-दो घंटे पर हल्का दूध, लाई, वनस्पति तेल व चीनी निर्धारित मात्रा में वजन के अनुसार देते हैं। दूसरे दिन तीन-तीन घंटे व तीसरे दिन चार घंटे के अंतराल पर यह भोजन देते हैं। इसे मिल्क डॉयट कहा जाता है। चौथे दिन से दूध में पानी की मात्रा काफी कम रहती है। छठवें दिन तक यही चलता है। सातवें दिन से इसी मिल्क डॉयट के साथ खिचड़ी, सूजी व बेसन का हलवा, अंडा, फल, आलू, चीनी व नमक की दलिया देना शुरू करते हैं। नियमित रूप से वजन करते रहते हैं। 14 दिन के इलाज में 15 प्रतिशत तक वजन में बढ़ोत्तरी का लक्ष्य रखा जाता है। 

15 दिन में बढ़ गया 3.3 किलो वजन

साऊंघाट ब्लॉक के तेनुवी गांव निवासी एक वर्षीय लाडली पुत्री राम जनम का वजन 15 दिन में 3.3 किलो बढ़ गया। तीन सितम्बर को फॉलो अप में पाया गया कि लाडली का वजन नियमित रूप से बढ़ रहा है। उसे एनआरसी में 18 जुलाई 2022 को भर्ती कराया, उस समय उसका वजन 5.5 किलो था। 31 जुलाई को डिस्चार्ज होते समय वजन बढ़कर 6.3 किलोग्राम हो गया। तीन सितम्बर को फॉलोअप के समय यह बढ़कर 8.8 किलो हो गया। पोषण युक्त डॉयट से यह संभव हो सका।   

चार प्रकार से होती है सैम की पहचान

- वजन व लम्बाई के अनुसार जेड स्कोर निकाला जाता है। मानक से कम होने पर सैम माना जाता है।

- अगर बच्चे की बांह की गोलाई 11.5 सेमी से कम है। 

- देखने में प्रथम दृष्टया बच्चा कुपोषित लग रहा है। 

- बच्चे के पैरों में सूजन है और उसे दबाने से गड्ढा पड़ रहा है।


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