‘‘पांच का पंच’’ और ‘‘पोषण 500’’ से गर्भावस्था से ही पड़ेगी सुपोषण की नींव

‘‘पांच का पंच’’ और ‘‘पोषण 500’’ से गर्भावस्था से ही पड़ेगी सुपोषण की नींव

संभव 3.0 अभियान के जरिये गर्भावस्था से ही मां बच्चे को सुपोषित बनाने की पहल

गोरखपुर। जिले में आजकल संभव 3.0 अभियान चल रहा है। इस दौरान ‘पांच का पंच’ और ‘‘पोषण 500’’ के जरिये गर्भावस्था से ही बच्चे के सुपोषण की नींव डालने की योजना है।यह अभियान सितम्बर तक चलेगा। इस अभियान के जरिए गर्भावस्था से ही मां और बच्चे को सुपोषित बनाने की कोशिश है। जून में शत प्रतिशत बच्चों की वृद्धि निगरानी, जुलाई माह में मातृत्व पोषण, अगस्त माह में छह माह तक के बच्चों के पोषण पर जोर और सितम्बर माह में पोषण माह मनाते हुए छह माह से अधिक उम्र के बच्चों में पूरक आहार को प्रोत्साहित किया जाएगा। इन सेवाओं को सफल बनाने में आईसीडीएस और स्वास्थ्य विभाग समेत कुल पांच विभागों को कंधे से कंधा मिला कर भूमिका निभाना है ।


जिला कार्यक्रम अधिकारी हेमंत सिंह का कहना है कि ‘‘पांच का पंच’’ के तहत सुनिश्चित करना है कि गर्भवती की कम से कम चार बार प्रसव पूर्व जांच हो जाए। गर्भावस्था के दौरान आहार विविधता और तिमाही के अनुसार भोजन की मात्रा का संदेश मिले व प्रत्येक गर्भवती को विभाग से टेक होम राशन अवश्य मिल जाए । हर एक गर्भवती तक आयरन और कैल्शियम की गोली पहुंच सके। गर्भावस्था के दौरान मासिक वजन की निगरानी हो और पोषण सम्बन्धित सही सलाह मिल सके। शत प्रतिशत संस्थागत प्रसव हो और बच्चे के जन्म के पहले घंटे में मां का गाढ़ा पीला दूध बच्चे को अवश्य मिल जाए। इन सभी सुविधाओं और सही सलाह के लिए गर्भावस्था का पता चलते ही आंगनबाड़ी कार्यकर्ता व आशा कार्यकर्ता से संपर्क करना होगा।

श्री सिंह ने बताया कि ‘‘पोषण 500’’ के तहत गर्भवती की पहली तिमाही में आंगनबाड़ी कार्यकर्ता उनका वजन और ऊंचाई मापेंगी । अगर वजन 45 किलो से और ऊंचाई 145 सेमी से कम है तो गर्भवती को कुपोषित माना जाएगा। इसी प्रकार हीमोग्लोबिन की मात्रा 11 फीसदी से कम होने पर गर्भवती को एनीमिक की श्रेणी में रखा जाता है। गर्भवती का यह सारा विवरण उसके एमसीपी कार्ड में भी दर्ज करवाया जाएगा । दूसरी और तीसरी तिमाही में भी मासिक वजन और वृद्धि को देखा जाएगा । अगर महिला का पोषण स्तर नहीं सुधरेगा तो छाया एकीकृत ग्राम/शहरी स्वास्थ्य, स्वच्छता व पोषण दिवस सत्र पर कराई जाने वाली जांच में आवश्यक कदम उठाए जाएंगे । साथ ही नियमित तौर पर स्वास्थ्य व पोषण परामर्श भी दिया जाएगा 

प्रथम छह माह में आशंका ज्यादा

आईसीडीएस विभाग में मुख्य सेविका मोहित सक्सेना का कहना है कि जन्म के प्रथम छह माह तक तीस फीसदी शिशु में दुबलापन व पतलापन की दिक्कत देखी गयी है । ऐसे ही बच्चे कुपोषण का शिकार होते हैं। अगर कोई गर्भवती व धात्री कुपोषित है तो उनका बच्चा भी कुपोषित हो जाएगा । अगर मां में समय से कुपोषण की पहचान हो जाए तो बच्चों को सुपोषित बनाया जा सकता है । गर्भावस्था से लेकर शिशु के छह माह तक (500) दिन पोषण की दृष्टि से अहम होते हैं ।

सही सलाह मिली तो सौरभ को मिला सुपोषण

महानगर के खूनीपुर की रहने वाली 30 वर्षीय उर्मिला का पहला बेटा सौरभ गर्भ में था तो वह बच्चे के जन्म से पहले न तो आंगनबाड़ी केंद्र की सेवा ले सकीं और न ही उन्होंने अस्पताल की सेवाएं लीं । सीधे बच्चे के जन्म के समय अस्पताल पहुंचीं। वह बताती हैं कि जब बेटा 1.2 वर्ष का हुआ तो उसे कई दिक्कते होने लगीं । तबीयत खराब रहती थी, बहुत ज्यादा सोता था, खाना नहीं खाता था और उठ बैठ भी नहीं पाता था। इसी बीच वह जाफरा बाजार आ गईं जहां सर्वे के दौरान आंगनबाड़ी कार्यकर्ता रेनू ने उनके बच्चे की स्क्रिनिंग की । बच्चा कुपोषित निकला। रेनू ने बच्चे को नियमित पोषाहार दिया और बताया कि पूरक आहार के साथ दो वर्ष तक स्तनपान जारी रखना है । बच्चे को इस्लामचक शहरी स्वास्थ्य केंद्र ले जाकर दवाएं दिलवाईं और चिकित्सक की नियमित निगरानी भी मिली । इस समय सौरभ 4.1 वर्ष का है और अब सुपोषित हो चुका है । आंगनबाड़ी कार्यकर्ता रेनू बताती हैं कि गर्भावस्था में सही खानपान न मिलने, आयरन, कैल्शियम व फोलिक की गोलियों का सेवन न करने के कारण उर्मिला का पहला बेटा कुपोषित हो गया था । दूसरे बेटे के समय यह सभी सेवाएं उर्मिला को मिल सकीं, जिससे वह जन्म से ही सुपोषित है । 

 कुपोषण की स्थिति

जिला कार्यक्रम अधिकारी ने बताया कि प्रदेश में गर्भधारण के समय पांच में से एक महिला कुपोषित होती हैं। दो में से एक महिला एनीमिक होती हैं । जन्म के समय पांच में से एक नवजात कम वजन का होता है । छह माह तक के पांच में से दो बच्चे दुबलेपन के शिकार हो जाते हैं । अगर पोषण पांच सौ और पांच का पंच थीम को सफल बनाने में सामुदायक सहयोग भी मिले तो यह स्थिति बदली जा सकती है ।

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